Posts

Showing posts from January, 2017

जल

पानी पानी पानी पानी जीवन का आधार है पानी. गर्मी से राहत दिलवाता हर प्राणी की प्यास बु1झाता अकुलाहट को दूर भगाता सबको निर्मल स्वच्छ बनाता. पानी पानी पानी पानी धरती का श्रृंगार है पानी. बादल बन अमृत बरसाता बन झरना यह सबको भाता नदियाँ बन यह कल कल गाता सीप का यह मोती बन जाता. पानी पानी पानी पानी सबका पालनहार है पानी. पेड़ों को हरियाली देता जीवों को नवजीवन धरती को खुशहाली देता करता सबको पावन.1 पानी पानी पानी पानी नहीं है कोई इसका सानी. पानी की कीमत पहचानों सीमित है पानी ये तुम जानो पर्यावरण को अपना मानो अपने दायित्वों को जानो. वर्ना एक दिन आएगा जब पानी ना बच पायेगा धरती का हर एक प्राणी पानी पानी चिल्लाएगा

पानी बचाएँ बने महान

पानी तो अनमोल है  उसको बचा के रखिये बर्बाद मत कीजिये इसे जीने का सलीका सीखिए पानी को तरसते हैं धरती पे काफी लोग यहाँ पानी ही तो दौलत है पानी सा धन भला कहां पानी की है मात्रा सीमित पीने का पानी और सीमित तो पानी को बचाइए इसी में है समृधी निहित शेविंग या कार की धुलाई या जब करते हो स्नान पानी की जरूर बचत करें पानी से है धरती महान जल ही तो जीवन है पानी है गुनों की खान पानी ही तो सब कुछ है पानी है धरती की शान पर्यावरण को न बचाया गया तो वो दिन जल्दी ही आएगा जब धरती पे हर इंसान बस ‘पानी पानी’ चिल्लाएगा रुपये पैसे धन दौलत कुछ भी काम न आएगा यदि इंसान इसी तरह धरती को नोच के खाएगा आने वाली पुश्तों का कुछ तो हम करें ख़्याल पानी के बगैर भविष्य भला कैसे होगा खुशहाल बच्चे, बूढे और जवान पानी बचाएँ बने महान अब तो जाग जाओ इंसान पानी में बसते हैं प्राण
मधुशाला मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला, प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला, पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा, सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१। प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला, एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला, जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका, आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।२। प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला, अपने को मुझमें भरकर तू बनता है पीनेवाला, मैं तुझको छक छलका करता, मस्त मुझे पी तू होता, एक दूसरे की हम दोनों आज परस्पर मधुशाला।।३। भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला, कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला, कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ! पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।।४। मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला, भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला, उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ, अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।।५। मदिरालय जाने को घर से चलता है पी...
मान लेना वसंत आ गया बागो में जब बहार आने लगे कोयल अपना गीत सुनाने लगे कलियों में निखार छाने लगे भँवरे जब उन पर मंडराने लगे मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !! खेतो में फसल पकने लगे खेत खलिहान लहलाने लगे डाली पे फूल मुस्काने लगे चारो और खुशबु फैलाने लगे मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !! आमो पे बौर जब आने लगे पुष्प मधु से भर जाने लगे भीनी भीनी सुगंध आने लगे तितलियाँ उनपे मंडराने लगे मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !! सरसो पे पीले पुष्प दिखने लगे वृक्षों में नई कोंपले खिलने लगे प्रकृति सौंदर्य छटा बिखरने लगे वायु भी सुहानी जब बहने लगे मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !! धूप जब मीठी लगने लगे सर्दी कुछ कम लगने लगे मौसम में बहार आने लगे ऋतु दिल को लुभाने लगे मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !! चाँद भी जब खिड़की से झाकने लगे चुनरी सितारों की झिलमिलाने लगे योवन जब फाग गीत गुनगुनाने लगे चेहरों पर रंग अबीर गुलाल छाने लगे मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !!
बेटियाँ रिश्तों-सी पाक होती हैं जो बुनती हैं एक शाल अपने संबंधों के धागे से। बेटियाँ धान-सी होती हैं पक जाने पर जिन्हें कट जाना होता है जड़ से अपनी फिर रोप दिया जाता है जिन्हें नई ज़मीन में। बेटियाँ मंदिर की घंटियाँ होती हैं जो बजा करती हैं कभी पीहर तो कभी ससुराल में। बेटियाँ पतंगें होती हैं जो कट जाया करती हैं अपनी ही डोर से और हो जाती हैं पराई। बेटियाँ टेलिस्कोप-सी होती हैं जो दिखा देती हैं– दूर की चीज़ पास। बेटियाँ इन्द्रधनुष-सी होती हैं, रंग-बिरंगी करती हैं बारिश और धूप के आने का इंतज़ार और बिखेर देती हैं जीवन में इन्द्रधनुषी छटा। बेटियाँ चकरी-सी होती हैं जो घूमती हैं अपनी ही परिधि में चक्र-दर-चक्र चलती हैं अनवरत बिना ग्रीस और तेल की चिकनाई लिए मकड़जाले-सा बना लेती हैं अपने इर्द-गिर्द एक घेरा जिसमें फँस जाती हैं वे स्वयं ही। बेटियाँ शीरीं-सी होती हैं मीठी और चाशनी-सी रसदार बेटियाँ गूँध दी जाती हैं आटे-सी बन जाने को गोल-गोल संबंधों की रोटियाँ देने एक बीज को जन्म। बेटियाँ दीये की लौ-सी होती हैं सुर्ख लाल जो बुझ जाने पर, दे जाती हैं चारों ओर ...
यादें बेहद ख़तरनाक होती हैं अमीना अक्सर कहा करती थी आप नहीं जानती आपा उन लम्हों को, जो अब अम्मी के लिए यादें हैं... ईशा की नमाज़ के वक़्त अक्सर अम्मी रोया करतीं और माँगतीं ढेरों दुआएँ बिछड़ गए थे जो सरहद पर, सैंतालीस के वक़्त उनके कलेजे के टुकड़े. उन लम्हों को आज भी वे जीतीं दो हज़ार दस में, वैसे ही जैसे था मंज़र उस वक़्त का ख़ौफनाक भयानक, जैसा कि अब हो चला है अम्मी का झुर्रीदार चेहरा, एकदम भरा सरहद की रेखाओं जैसी आड़ी-टेढ़ी कई रेखाओं से, बोझिल, निस्तेज और ओजहीन !
कविता मुझे लिखती है या, मैं कविता को समझ नहीं पाती जब भी उमड़ती है भीतर की सुगबुगाहट कविता गढ़ती है शब्द और शब्द गन्धाते हैं कविता जैसे चौपाल से संसद तक गढ़ी जाती हैं ज़ुल्म की अनगिनत कहानियाँ, वैसे ही, मुट्ठी भर शब्दों से गढ़ दी जाती है काग़ज़ों पर अनगिनत कविताएँ और कविताओं में अनगिनत नक़्श, नुकीले, चपटे और घुमावदार जो नहीं होते सीधे सपाट व सहज वर्णमाला की तरह !!