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Showing posts from 2017

मुक्तिबोध की कविता (काव्य)

मैं बना उन्माद री सखि, तू तरल अवसाद प्रेम - पारावार पीड़ा, तू सुनहली याद तैल तू तो दीप मै हूँ, सजग मेरे प्राण। रजनि में जीवन-चिता औ' प्रात मे निर्वाण शुष्क तिनका तू बनी तो पास ही मैं धूल आम्र में यदि कोकिला तो पास ही मैं हूल फल-सा यदि मैं बनूं तो शूल-सी तू पास विँधुर जीवन के शयन को तू मधुर आवास सजल मेरे प्राण है री, सजग मेरे प्राण तू बनी प्राण! मै तो आलि चिर-म्रियमाण। -मुक्तिबोध [मुक्तिबोध रचनावली, कर्मवीर, 25 जनवरी 1936 में प्रकाशित

एक भी आँसू न कर बेकार (काव्य) 30 रचनाकार: रामावतार त्यागी

एक भी आँसू न कर बेकार - जाने कब समंदर मांगने आ जाए! पास प्यासे के कुआँ आता नहीं है, यह कहावत है, अमरवाणी नहीं है, और जिस के पास देने को न कुछ भी एक भी ऐसा यहाँ प्राणी नहीं है, कर स्वयं हर गीत का श्रृंगार जाने देवता को कौनसा भा जाए! चोट खाकर टूटते हैं सिर्फ दर्पण किन्तु आकृतियाँ कभी टूटी नहीं हैं, आदमी से रूठ जाता है सभी कुछ- पर समस्याएं कभी रूठी नहीं हैं, हर छलकते अश्रु को कर प्यार जाने आत्मा को कौन सा नहला जाए! व्यर्थ है करना खुशामद रास्तों की, काम अपने पाँव ही आते सफर में, वह न ईश्वर के उठाए भी उठेगा- जो स्वयं गिर जाए अपनी ही नज़र में, हर लहर का कर प्रणय स्वीकार- जाने कौन तट के पास पहुँचा जाए! - रामावतार त्यागी
पूजे पाहन पानी दादू दुनिया दीवानी, पूजे पाहन पानी। गढ़ मूरत मंदिर में थापी, निव निव करत सलामी। चन्दन फूल अछत सिव ऊपर बकरा भेट भवानी। छप्पन भोग लगे ठाकुर को पावत चेतन न प्रानी। धाय-धाय तीरथ को ध्यावे, साध संग नहिं मानी। ताते पड़े करम बस फन्दे भरमें चारों खानी। बिन सत्संग सार नहिं पावै फिर-फिर भरम भुलानी। रूप रंग से न्यारा दादू देखा मैं प्यारा, अगम जो पंथ निहारा। अष्ट कँवल दल सुरत सबद में, रूप रंग से न्यारा। पिण्ड ब्रह्माण्ड और वेद कितेवे, पाँच तत्त के पारा। सत्त लोक जहँ पुरु बिदेही वह साहिब करतारा। आदि जोत और काल निरंजन, इनका कहाँ न पसारा। राम रहीम रब्ब नहीं आतम, मोहम्मद नहीं औतारा। सब संतन के चरन सीस धर चीन्हा सार असारा।

कविता - मां मेरे कत्ल की हां क्यूं भरे

शकुंतला सरुपरिया मां मेरे कत्ल की तू हां क्यूं भरे? खि‍लने से पहले इक कली क्यूं झरे ? मेरे बाबुल बता, मेरी क्या खता? मेरे मरने की बददुआ क्यूं करे ? कौन कहता है, रब की सूरत तू? कोई रब यूं किसी का खून क्यूं करे ? तेरे कदमों में मां जो जन्नत है, उसे  कत्लगाह क्यूं करे? झांक के कोख में मशीनों से, मुझे साजिश से परे क्यूं करे ? कोख का तू किराया लेना वसूल, कत्ल का पाप तेरे सर क्यूं धरे? मुझसे क्या खतरा-खौफ तू बता ? तेरी मूरत हूं, मुझसे तू क्यूं डरे ? ये तो सच है कि मां तू पत्थर है, मुझपे पत्थर कोई, रहम क्यूं करे ?

कन्या भ्रूण की गुहार : मैं जीने को बहाना हूं

शकुंतला सरुपरिया पराया धन क्यों कहते हो, तुम्हारा ही खजाना हूं जीने दो कोख में मुझको, मैं जीने को बहाना हूं दरों-दीवार दरवाजे, हर आंगन की जरूरत हूं मोहब्बत हूं मैं देहरी, मैं खुशि‍यों का फसाना हूं कहीं बेटी, कहीं बहाना, कहीं बीवी, कहीं हूं मां, मैं रिश्तों का वो संदल हूं, मैं खुशबू का घराना हूं मैं मेहमां हूं, परिंदा हूं, पड़ोसी का वो पौधा भी क्यूं माना मुझको बर्बादी, गमों का क्यूं तराना हूं सुबह हूं, रात हूं, गुल हूं, जमी मैं, आसमा भी मैं मैं सूरज-चांद-तारा हूं, मैं दुनिया, मैं जमाना हूं दुआ हूं मैं ही तो रब की, मैं भोला हूं मैं ही भाबनम लहर हूं मैं, समंदर हूं, मैं गुलशन, मैं वीराना हूं हजारों साल-ओ-सदियां मेरी बेनूरी को रोए दीदावर कोई तो कहते मैं तो बेटी का दीवाना हूं

महिला दिवस कविता- तीसरी मानसिकता

गीतिका नेमा कुछ लोग जो समाज में कुंठाओं और कुरीतियों को मिटाकर लाना चाहते हैं, सामाजिक समरसता और समानता। कर रहे हैं कार्य बिना थके, हर पल पहल करने को अग्रसर। करना चाहते हैं महिलाओं का उत्थान भी पर ये क्या...? स्वयं की कुंठाओं और कुरीतियों को छुपाकर, अपनी बहन-बेटियों को पर्दे में रख समाज की लड़कियों को घुमाना चाहते हैं पब, डिस्को और न जाने कहां-कहां... कराना चाहते हैं नाच-गाना ठेकेदार बन समाज के टूटे से सामाजिक मंच पर। बनना चाहते हैं समाज सुधारक, लेना चाहते हैं विचारक होने का श्रेय, पर न तो वे राजा राममोहन राय के वंशज हैं और न ही उनके परिवार में ऐसा कुछ चला आया है। बस वे बताना चाहते हैं स्वयं को महान जिससे छुपा सकें अपना दो-मुहां चेहरा और दोहरे-तिगुने चरित्र। बताना चाहूंगी मैं पक्षधर नहीं पित्तसत्तात्मक समाज की और न ही ऐसी घृणित मानसिकता की। मुझे घर-परिवार में मिले हैं स्वतंत्रता, समानता के अधिकार भी। लेकिन बात है उन लड़कियों की जो बहकावे में है उनके जिन्हें नहीं है अपनी ही परवरिश पर भरोसा तभी तो बांधे रहना चाहते हैं घर पर ही अपनी ...

पाखी

भर ले अपनी उड़ान  रुचि गोयल| देर न कर जाग तू, भर ले अब उड़ान तू आग है जो अंदर तेरे, उसको अब जल तू खुद को पहचान तू, शक्ति है, तू देवी है, शेरनी है तू, अपने अंदर की ताकत से, खुद को जीत ले तू देर न कर जाग तू, भर ले अब उड़ान तू जननी है, माता है तू, सहेनशक्तिशाली है तू, हर दर्द से लड़कर, खुद को नया जीवन तो दे तू, देर न कर जाग तू, भर ले अब उड़ान तू रहा दिखाए, सबको चलना सिखाए कदम कदम साथ निभाए तू, अब हर बेड़ी को तोड़ कर, एक कदम तो बढ़ा तू देर न कर जाग तू, भर ले अब उड़ान तू देर न कर जाग तू, भर ले अब उड़ान तू

मनीषा कुशवाह

सुरों की सरिता गंगा.... तू तो पावन सावन है। झर-झर बहता जल झरनों से तू तो गहरा सागर है। कुछ दूरी है....कुछ चिंतन है, कुछ रिश्तों की धूरी है। सरल सहज है मेरी लेखनी, शब्दों की अभिव्यक्ति है। तन उजास और मन उजास, उर भावों का ये बंधन है। शंखनाद है मेरे मन का, खमोशी का विसर्जन है। होले से कहती हो, सुन लो यही तर्क है भावों का। अभिनंदन हो हर नारी का, मैला न परिधान रहे। चित्त में गूंजे मधुर गान, और मन का ये श्रृंगार रहे। राहें नापो मंजिल की, पथ पर नई पहचान मिले। सात सुरों की सरिता गंगा... तू तो पावन सावन है।।  

जल

पानी पानी पानी पानी जीवन का आधार है पानी. गर्मी से राहत दिलवाता हर प्राणी की प्यास बु1झाता अकुलाहट को दूर भगाता सबको निर्मल स्वच्छ बनाता. पानी पानी पानी पानी धरती का श्रृंगार है पानी. बादल बन अमृत बरसाता बन झरना यह सबको भाता नदियाँ बन यह कल कल गाता सीप का यह मोती बन जाता. पानी पानी पानी पानी सबका पालनहार है पानी. पेड़ों को हरियाली देता जीवों को नवजीवन धरती को खुशहाली देता करता सबको पावन.1 पानी पानी पानी पानी नहीं है कोई इसका सानी. पानी की कीमत पहचानों सीमित है पानी ये तुम जानो पर्यावरण को अपना मानो अपने दायित्वों को जानो. वर्ना एक दिन आएगा जब पानी ना बच पायेगा धरती का हर एक प्राणी पानी पानी चिल्लाएगा

पानी बचाएँ बने महान

पानी तो अनमोल है  उसको बचा के रखिये बर्बाद मत कीजिये इसे जीने का सलीका सीखिए पानी को तरसते हैं धरती पे काफी लोग यहाँ पानी ही तो दौलत है पानी सा धन भला कहां पानी की है मात्रा सीमित पीने का पानी और सीमित तो पानी को बचाइए इसी में है समृधी निहित शेविंग या कार की धुलाई या जब करते हो स्नान पानी की जरूर बचत करें पानी से है धरती महान जल ही तो जीवन है पानी है गुनों की खान पानी ही तो सब कुछ है पानी है धरती की शान पर्यावरण को न बचाया गया तो वो दिन जल्दी ही आएगा जब धरती पे हर इंसान बस ‘पानी पानी’ चिल्लाएगा रुपये पैसे धन दौलत कुछ भी काम न आएगा यदि इंसान इसी तरह धरती को नोच के खाएगा आने वाली पुश्तों का कुछ तो हम करें ख़्याल पानी के बगैर भविष्य भला कैसे होगा खुशहाल बच्चे, बूढे और जवान पानी बचाएँ बने महान अब तो जाग जाओ इंसान पानी में बसते हैं प्राण
मधुशाला मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला, प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला, पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा, सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१। प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला, एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला, जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका, आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।२। प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला, अपने को मुझमें भरकर तू बनता है पीनेवाला, मैं तुझको छक छलका करता, मस्त मुझे पी तू होता, एक दूसरे की हम दोनों आज परस्पर मधुशाला।।३। भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला, कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला, कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ! पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।।४। मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला, भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला, उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ, अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।।५। मदिरालय जाने को घर से चलता है पी...
मान लेना वसंत आ गया बागो में जब बहार आने लगे कोयल अपना गीत सुनाने लगे कलियों में निखार छाने लगे भँवरे जब उन पर मंडराने लगे मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !! खेतो में फसल पकने लगे खेत खलिहान लहलाने लगे डाली पे फूल मुस्काने लगे चारो और खुशबु फैलाने लगे मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !! आमो पे बौर जब आने लगे पुष्प मधु से भर जाने लगे भीनी भीनी सुगंध आने लगे तितलियाँ उनपे मंडराने लगे मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !! सरसो पे पीले पुष्प दिखने लगे वृक्षों में नई कोंपले खिलने लगे प्रकृति सौंदर्य छटा बिखरने लगे वायु भी सुहानी जब बहने लगे मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !! धूप जब मीठी लगने लगे सर्दी कुछ कम लगने लगे मौसम में बहार आने लगे ऋतु दिल को लुभाने लगे मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !! चाँद भी जब खिड़की से झाकने लगे चुनरी सितारों की झिलमिलाने लगे योवन जब फाग गीत गुनगुनाने लगे चेहरों पर रंग अबीर गुलाल छाने लगे मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !!
बेटियाँ रिश्तों-सी पाक होती हैं जो बुनती हैं एक शाल अपने संबंधों के धागे से। बेटियाँ धान-सी होती हैं पक जाने पर जिन्हें कट जाना होता है जड़ से अपनी फिर रोप दिया जाता है जिन्हें नई ज़मीन में। बेटियाँ मंदिर की घंटियाँ होती हैं जो बजा करती हैं कभी पीहर तो कभी ससुराल में। बेटियाँ पतंगें होती हैं जो कट जाया करती हैं अपनी ही डोर से और हो जाती हैं पराई। बेटियाँ टेलिस्कोप-सी होती हैं जो दिखा देती हैं– दूर की चीज़ पास। बेटियाँ इन्द्रधनुष-सी होती हैं, रंग-बिरंगी करती हैं बारिश और धूप के आने का इंतज़ार और बिखेर देती हैं जीवन में इन्द्रधनुषी छटा। बेटियाँ चकरी-सी होती हैं जो घूमती हैं अपनी ही परिधि में चक्र-दर-चक्र चलती हैं अनवरत बिना ग्रीस और तेल की चिकनाई लिए मकड़जाले-सा बना लेती हैं अपने इर्द-गिर्द एक घेरा जिसमें फँस जाती हैं वे स्वयं ही। बेटियाँ शीरीं-सी होती हैं मीठी और चाशनी-सी रसदार बेटियाँ गूँध दी जाती हैं आटे-सी बन जाने को गोल-गोल संबंधों की रोटियाँ देने एक बीज को जन्म। बेटियाँ दीये की लौ-सी होती हैं सुर्ख लाल जो बुझ जाने पर, दे जाती हैं चारों ओर ...
यादें बेहद ख़तरनाक होती हैं अमीना अक्सर कहा करती थी आप नहीं जानती आपा उन लम्हों को, जो अब अम्मी के लिए यादें हैं... ईशा की नमाज़ के वक़्त अक्सर अम्मी रोया करतीं और माँगतीं ढेरों दुआएँ बिछड़ गए थे जो सरहद पर, सैंतालीस के वक़्त उनके कलेजे के टुकड़े. उन लम्हों को आज भी वे जीतीं दो हज़ार दस में, वैसे ही जैसे था मंज़र उस वक़्त का ख़ौफनाक भयानक, जैसा कि अब हो चला है अम्मी का झुर्रीदार चेहरा, एकदम भरा सरहद की रेखाओं जैसी आड़ी-टेढ़ी कई रेखाओं से, बोझिल, निस्तेज और ओजहीन !
कविता मुझे लिखती है या, मैं कविता को समझ नहीं पाती जब भी उमड़ती है भीतर की सुगबुगाहट कविता गढ़ती है शब्द और शब्द गन्धाते हैं कविता जैसे चौपाल से संसद तक गढ़ी जाती हैं ज़ुल्म की अनगिनत कहानियाँ, वैसे ही, मुट्ठी भर शब्दों से गढ़ दी जाती है काग़ज़ों पर अनगिनत कविताएँ और कविताओं में अनगिनत नक़्श, नुकीले, चपटे और घुमावदार जो नहीं होते सीधे सपाट व सहज वर्णमाला की तरह !!