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Showing posts from March, 2017

मुक्तिबोध की कविता (काव्य)

मैं बना उन्माद री सखि, तू तरल अवसाद प्रेम - पारावार पीड़ा, तू सुनहली याद तैल तू तो दीप मै हूँ, सजग मेरे प्राण। रजनि में जीवन-चिता औ' प्रात मे निर्वाण शुष्क तिनका तू बनी तो पास ही मैं धूल आम्र में यदि कोकिला तो पास ही मैं हूल फल-सा यदि मैं बनूं तो शूल-सी तू पास विँधुर जीवन के शयन को तू मधुर आवास सजल मेरे प्राण है री, सजग मेरे प्राण तू बनी प्राण! मै तो आलि चिर-म्रियमाण। -मुक्तिबोध [मुक्तिबोध रचनावली, कर्मवीर, 25 जनवरी 1936 में प्रकाशित

एक भी आँसू न कर बेकार (काव्य) 30 रचनाकार: रामावतार त्यागी

एक भी आँसू न कर बेकार - जाने कब समंदर मांगने आ जाए! पास प्यासे के कुआँ आता नहीं है, यह कहावत है, अमरवाणी नहीं है, और जिस के पास देने को न कुछ भी एक भी ऐसा यहाँ प्राणी नहीं है, कर स्वयं हर गीत का श्रृंगार जाने देवता को कौनसा भा जाए! चोट खाकर टूटते हैं सिर्फ दर्पण किन्तु आकृतियाँ कभी टूटी नहीं हैं, आदमी से रूठ जाता है सभी कुछ- पर समस्याएं कभी रूठी नहीं हैं, हर छलकते अश्रु को कर प्यार जाने आत्मा को कौन सा नहला जाए! व्यर्थ है करना खुशामद रास्तों की, काम अपने पाँव ही आते सफर में, वह न ईश्वर के उठाए भी उठेगा- जो स्वयं गिर जाए अपनी ही नज़र में, हर लहर का कर प्रणय स्वीकार- जाने कौन तट के पास पहुँचा जाए! - रामावतार त्यागी
पूजे पाहन पानी दादू दुनिया दीवानी, पूजे पाहन पानी। गढ़ मूरत मंदिर में थापी, निव निव करत सलामी। चन्दन फूल अछत सिव ऊपर बकरा भेट भवानी। छप्पन भोग लगे ठाकुर को पावत चेतन न प्रानी। धाय-धाय तीरथ को ध्यावे, साध संग नहिं मानी। ताते पड़े करम बस फन्दे भरमें चारों खानी। बिन सत्संग सार नहिं पावै फिर-फिर भरम भुलानी। रूप रंग से न्यारा दादू देखा मैं प्यारा, अगम जो पंथ निहारा। अष्ट कँवल दल सुरत सबद में, रूप रंग से न्यारा। पिण्ड ब्रह्माण्ड और वेद कितेवे, पाँच तत्त के पारा। सत्त लोक जहँ पुरु बिदेही वह साहिब करतारा। आदि जोत और काल निरंजन, इनका कहाँ न पसारा। राम रहीम रब्ब नहीं आतम, मोहम्मद नहीं औतारा। सब संतन के चरन सीस धर चीन्हा सार असारा।

कविता - मां मेरे कत्ल की हां क्यूं भरे

शकुंतला सरुपरिया मां मेरे कत्ल की तू हां क्यूं भरे? खि‍लने से पहले इक कली क्यूं झरे ? मेरे बाबुल बता, मेरी क्या खता? मेरे मरने की बददुआ क्यूं करे ? कौन कहता है, रब की सूरत तू? कोई रब यूं किसी का खून क्यूं करे ? तेरे कदमों में मां जो जन्नत है, उसे  कत्लगाह क्यूं करे? झांक के कोख में मशीनों से, मुझे साजिश से परे क्यूं करे ? कोख का तू किराया लेना वसूल, कत्ल का पाप तेरे सर क्यूं धरे? मुझसे क्या खतरा-खौफ तू बता ? तेरी मूरत हूं, मुझसे तू क्यूं डरे ? ये तो सच है कि मां तू पत्थर है, मुझपे पत्थर कोई, रहम क्यूं करे ?

कन्या भ्रूण की गुहार : मैं जीने को बहाना हूं

शकुंतला सरुपरिया पराया धन क्यों कहते हो, तुम्हारा ही खजाना हूं जीने दो कोख में मुझको, मैं जीने को बहाना हूं दरों-दीवार दरवाजे, हर आंगन की जरूरत हूं मोहब्बत हूं मैं देहरी, मैं खुशि‍यों का फसाना हूं कहीं बेटी, कहीं बहाना, कहीं बीवी, कहीं हूं मां, मैं रिश्तों का वो संदल हूं, मैं खुशबू का घराना हूं मैं मेहमां हूं, परिंदा हूं, पड़ोसी का वो पौधा भी क्यूं माना मुझको बर्बादी, गमों का क्यूं तराना हूं सुबह हूं, रात हूं, गुल हूं, जमी मैं, आसमा भी मैं मैं सूरज-चांद-तारा हूं, मैं दुनिया, मैं जमाना हूं दुआ हूं मैं ही तो रब की, मैं भोला हूं मैं ही भाबनम लहर हूं मैं, समंदर हूं, मैं गुलशन, मैं वीराना हूं हजारों साल-ओ-सदियां मेरी बेनूरी को रोए दीदावर कोई तो कहते मैं तो बेटी का दीवाना हूं

महिला दिवस कविता- तीसरी मानसिकता

गीतिका नेमा कुछ लोग जो समाज में कुंठाओं और कुरीतियों को मिटाकर लाना चाहते हैं, सामाजिक समरसता और समानता। कर रहे हैं कार्य बिना थके, हर पल पहल करने को अग्रसर। करना चाहते हैं महिलाओं का उत्थान भी पर ये क्या...? स्वयं की कुंठाओं और कुरीतियों को छुपाकर, अपनी बहन-बेटियों को पर्दे में रख समाज की लड़कियों को घुमाना चाहते हैं पब, डिस्को और न जाने कहां-कहां... कराना चाहते हैं नाच-गाना ठेकेदार बन समाज के टूटे से सामाजिक मंच पर। बनना चाहते हैं समाज सुधारक, लेना चाहते हैं विचारक होने का श्रेय, पर न तो वे राजा राममोहन राय के वंशज हैं और न ही उनके परिवार में ऐसा कुछ चला आया है। बस वे बताना चाहते हैं स्वयं को महान जिससे छुपा सकें अपना दो-मुहां चेहरा और दोहरे-तिगुने चरित्र। बताना चाहूंगी मैं पक्षधर नहीं पित्तसत्तात्मक समाज की और न ही ऐसी घृणित मानसिकता की। मुझे घर-परिवार में मिले हैं स्वतंत्रता, समानता के अधिकार भी। लेकिन बात है उन लड़कियों की जो बहकावे में है उनके जिन्हें नहीं है अपनी ही परवरिश पर भरोसा तभी तो बांधे रहना चाहते हैं घर पर ही अपनी ...

पाखी

भर ले अपनी उड़ान  रुचि गोयल| देर न कर जाग तू, भर ले अब उड़ान तू आग है जो अंदर तेरे, उसको अब जल तू खुद को पहचान तू, शक्ति है, तू देवी है, शेरनी है तू, अपने अंदर की ताकत से, खुद को जीत ले तू देर न कर जाग तू, भर ले अब उड़ान तू जननी है, माता है तू, सहेनशक्तिशाली है तू, हर दर्द से लड़कर, खुद को नया जीवन तो दे तू, देर न कर जाग तू, भर ले अब उड़ान तू रहा दिखाए, सबको चलना सिखाए कदम कदम साथ निभाए तू, अब हर बेड़ी को तोड़ कर, एक कदम तो बढ़ा तू देर न कर जाग तू, भर ले अब उड़ान तू देर न कर जाग तू, भर ले अब उड़ान तू

मनीषा कुशवाह

सुरों की सरिता गंगा.... तू तो पावन सावन है। झर-झर बहता जल झरनों से तू तो गहरा सागर है। कुछ दूरी है....कुछ चिंतन है, कुछ रिश्तों की धूरी है। सरल सहज है मेरी लेखनी, शब्दों की अभिव्यक्ति है। तन उजास और मन उजास, उर भावों का ये बंधन है। शंखनाद है मेरे मन का, खमोशी का विसर्जन है। होले से कहती हो, सुन लो यही तर्क है भावों का। अभिनंदन हो हर नारी का, मैला न परिधान रहे। चित्त में गूंजे मधुर गान, और मन का ये श्रृंगार रहे। राहें नापो मंजिल की, पथ पर नई पहचान मिले। सात सुरों की सरिता गंगा... तू तो पावन सावन है।।